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बुधवार, 31 जनवरी 2024

30 वर्षों में बनने वाला अनोखा योग, जिसकी अशुभता सुखों को संघर्ष बना देती है(happiness into a struggle)?

A unique combination formed in 30 years
A unique combination formed in 30 years, whose inauspiciousness turns happiness into a struggle?


30 वर्षों में बनने वाला अनोखा योग जिसकी अशुभता सुखों को संघर्ष बना देती है? 

कोई जातक जिस प्रकार कई महान् कार्य करने के उपरान्त भी एक नीच कर्म समस्त उपलब्धियों को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार प्रारब्ध के चलते अनेक राजयोग एवं शुभ योगों के साथ राजयोगभंगकारक कोई एक योग समस्त राजयोगों एवं शुभ योगों के फलों को समाप्त कर देता है। ज्योतिष ग्रन्थों में ऐसे अनेक योग मिलते हैं। उसी प्रकार का एक योग है 'लालाटिक योग । 

लालाटिक योग की परिभाषा:-

‘लालाटिक' का शाब्दिक अर्थ है 'निठल्ला', 'लापरवाह', 'निरर्थक व्यक्ति, 'केवल भाग्य पर आश्रित होने वाला' इत्यादि। यहाँ के सन्दर्भ में लालाटिक का अर्थ भाग्यवशात् असफल व्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। मानसागरी में दी गई इस योग की परिभाषा के अनुसार यदि जन्मपत्रिका में लग्न से अष्टम भाव में चन्द्रमा हो और कर्क राशि में सूर्य, शनि एवं शुक्र स्थित हों तथा पूर्ण केमद्रुम योग हो, तो लालाटिक योग कहा जाता है- 

चन्द्रोऽष्टमे चन्द्रगेहेऽर्कार्किशुक्रखगाः स्थिताः । 

केमद्रुमे च सम्पूर्णे योगो लालाटिको मतः।। 

इस प्रकार इस योग की निम्नलिखित शर्तें हैं :

1. चन्द्रमा अष्टम भाव में स्थित होना चाहिए।

2. चन्द्रमा से एक राशि पूर्व और एक राशि पश्चात् पंचतारा ग्रहों में से कोई ग्रह स्थित नहीं हो अर्थात्  केमद्रुम योग हो।

3. सूर्य, शुक्र एवं शनि कर्क राशि में स्थित हों।

उपर्युक्त तृतीय शर्त के अनुसार यह योग केवल

शनि के कर्क राशि में निर्मित होने पर ही हो सकता है। इस प्रकार यह योग 30 वर्षों के अन्तराल से निर्मित होता है। कर्क राशि में शनि निम्नलिखित अवधि में पिछले कुछ वर्षों में रहा है अथवा अगले कुछ वर्षों में रहेगा-

(1) 11 जून, 1946 से 25 जुलाई, 1948

(2) 23 जुलाई, 1975 से 07 सितम्बर, 1977

(3) 06 सितम्बर, 2004 से 01 नवम्बर, 2006

(4) 13 जुलाई, 2034 से 27 अगस्त, 2036

(5) 24 अगस्त, 2063 से 03 जुलाई, 2066

(6) 02 जुलाई, 2093 से 18 अगस्त, 2095

उक्त अवधि में 16 जुलाई से 17 अगस्त के बीच जन्म लेने वाले लोगों की जन्मपत्रिका में इस योग की सम्भावना उस समय है, जब सूर्य और शुक्र भी कर्क राशि में ही हो। इस प्रकार यह अत्यन्त दुर्लभ योग है। 

लालाटिक योग का मुख्य लक्षण कर्क राशि में | मिलते हैं। ऐसे योगों को आंशिक 'लालाटिक योग’ शनि के साथ सूर्य और शुक्र की युति है। चन्द्रमा की अष्टमस्थ स्थिति और केमद्रुम योग सहायक के रूप में हैं। यदि अष्टम भाव में पापग्रह स्थिति हो और केमद्रुम के स्थान पर अन्य कोई अशुभ योग यथा; कालसर्प, शकट आदि हो, तो भी लालाटिक योग के परिणाम मिलते हैं। ऐसे योगों में आंशिक 'लालाटिक योग' कह सकते है |  

यह योग धनु लग्न में सबसे अधिक दुष्प्रभाव देने वाला होता है, वहीं दूसरी ओर मेष, वृषभ, तुला, मकर एवं कुम्भ लग्न में यह बहुत अधिक अष्टम आदि भावों में बनने वाला लालाटिक योग यद्यपि सांसारिक सुखों में बाधाकारक होता है, परन्तु आध्यात्मिक प्रगति एवं अलौकिक शक्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। अशुभ नहीं होता। चन्द्रमा के साथ युति होने पर अष्टम भाव में यदि इस योग का निर्माण होता है, तो यह अत्यधिक अशुभ फल देने वाला होता है। अष्टम भाव में यह धनु लग्न की कुण्डली में बनता है।

लालाटिक योग के फल:-

लालाटिक योग में चन्द्रमा के साथ-साथ सूर्य, शुक्र एवं शनि प्रभावित होते हैं। ज्योतिष का सिद्धान्त है कि चन्द्रमा सभी ग्रहों को बल देता है | अष्टमस्थ होने पर और केमद्रुम योग बनने पर वह पीड़ित होगा, वहीं उसकी राशि कर्क सूर्य एवं शनि के कारण पीडित है।

चन्द्रमा के पीडित होने पर मन मस्तिष्क प्रभावित होता गलत निर्णय होते हैं तथा निराशा, आलस्य, प्रमाद एवं लापरवाही जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं। शनि के कारण सूर्य पीड़ित होता है। सूर्य कर्म, राजयोग आदि का कारक होने से करिअर प्रभावित होता है। पारिवारिक जीवन, सुख एवं ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति में शुक्र की महती भूमिका होती है। सूर्य एवं शनि से पीड़ित होकर जीवन में इनका अभाव देखने को मिलता है। सूर्य से पीड़ित होकर शनि दुर्बल एवं अशुभ हो जाता है, जिसका प्रतिफल जीवन में उतार-चढ़ाव, निराशा, दु:ख, संघर्ष आदि के रूप में देखने को मिलता है। इन सबका मिला-जुला फल लालाटिक योग होने पर मिलता है।

A unique combination formed in 30 years , in mansagri book
A unique combination formed in 30 years, whose inauspiciousness turns happiness into a struggle?


"मानसागरी" में लालाटिक योग के परिणामों के सम्बन्ध में कहा गया है कि ऐसा जातक मुसल के समान आकृति वाला, शिल्पकला में निपुण बहुपुत्रवान् हुआ भी अनेक प्रकार से दरिद्रता को प्राप्त होता है। जन्मान्तर के बाद भी दरिद्रता उसे नहीं छोड़ती- 

आजन्मो भवति कारकगैः प्रसिद्धः शिल्पादिकर्मकुशलो मुशलाकृतिश्च।

भूर्यात्मजोऽपि लभते विविधामलक्ष्मीं जन्मान्तरेऽपि न जहाति ललाटियोगः ॥

व्यवहार में लालाटिक योग के निम्नलिखित फल देखे गए हैं :

1. लालाटिक योग के चलते जातक को उसकी योग्यता, परिश्रम एवं अनुभव के अनुरूप प्रतिफल, यश एवं मान्यता की प्राप्ति नहीं होती। 2. जातक को पारिवारिक सुख अपेक्षित प्राप्त नहीं होता।

3. जीवन में उतार-चढ़ाव अधिक आते हैं और कॅरिअर में अनिश्चितता बनी रहती है।

4. आर्थिक संकट एवं दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। वित्तीय उतार-चढ़ाव की अधिकता देखने को मिलती है।

5. जातक जीवन में गलत निर्णय लेता हैं और उनके कारण उसे पछताना भी पड़ जाता है।

6 आठवे भाव आदि भावों में बनने वाला लालाटिक योग यद्यपि सांसारिक सुखों में बाधाकारक होता है. परन्तु आध्यात्मिक प्रगति एवं अलौकिक शक्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। अथवा असामयिक मृत्यु की भी आशंका रहती है।

7. जातक आत्महत्या कर सकता है अथवा असमय मृत्यु हो सकती है |

8. जातक को भाग्य का सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। राजयोग आदि शुभ योगों के फल नहीं मिलते। परिश्रम एवं संघर्ष की अधिकता रहती है। परिश्रम के अनुरूप प्रतिफलों की प्राप्ति नहीं होती। 

उदाहरण- (उपरोक्त कुंडली में )

जन्म दिनांक: 20 जुलाई 1976

जन्म समय: 12:10 बजे

जन्म स्थान जयपुर (राज.)

जन्मकुण्डली

उपर्युक्त जन्मपत्रिका में सूर्य, बुध, शुक्र एवं शनि की युति कर्क राशि में हो रही है तथा चन्द्रमा लग्न से अष्टम भाव में है, परन्तु चन्द्रमा से द्वितीय स्थान में गुरु होने से केमद्रुम योग का निर्माण नहीं हो रहा है। इसलिए पूर्ण लालाटिक योग निर्मित नहीं हुआ, फिर भी जातक के जीवन में उतार-चढ़ाव को देखते हुए इस योग के प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं। जातक व्यवसाय करता है, परन्तु अभी तक चार-पाँच व्यवसाय बदल चुका है। पिता व्यवसायी हैं और उन्होंने अपने व्यवसाय में ही जातक को लगाया, परन्तु कुछ वर्षों बाद ही जातक ने अलग से व्यवसाय करने की. माँग रखी। पिता ने अलग से व्यवसाय भी आरम्भ करवा दिया, परन्तु कुछ वर्षों में ही वह बन्द करना पड़ा। बाद में रिअल एस्टेट में फ्लेट बनाकर बेचने का व्यवसाय आरम्भ किया। तीन-चार साल अच्छी कमाई हुई, परन्तु बाद में वह कर्जे के साथ बन्द करना पड़ा। उसके बाद भी दो व्यवसाय जातक कर चुका है, अभी भी वह अपने वर्तमान व्यवसाय से सन्तुष्ट नहीं है। जातक की जन्मपत्रिका में कालसर्पयोग का भी निर्माण हो रहा है। यद्यपि शुक्र-बुध एवं शनि की युति राजयोगकारक है, परन्तु आंशिक लालाटिक और कालसर्पयोग योग के चलते उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाये। 

उदाहरण-

जन्म दिनांक : 27 जुलाई, 1976

जन्म समय : 17:20 बजे

जन्म स्थान जयपुर (राज.)

यह एक अध्यापिका की जन्मपत्रिका है। लग्नेश गुरु का द्वितीय एवं दशम भाव पर दृष्टि प्रभाव है। जन्मपत्रिका में लालाटिक योग का निर्माण हो रहा है।

अष्टम भाव सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र एवं शनि की युति है। चन्द्रमा से द्वितीय भाव में मंगल होने से केमद्रुम योग का निर्माण नहीं हो रहा है, परन्तु जातिका के जीवन में लालाटिक योग का पूर्ण प्रभाव देखने को मिलता है।

जातिका का विवाह विलम्ब से हुआ, परन्तु उसे वैवाहिक सुख नहीं मिला। पति एवं ससुराल वालों की प्रताड़ना के

चलते उसे ससुराल छोड़कर आना पड़ा। बाद में उसने बी.एड. की और अध्यापन का कार्य आरम्भ किया। जातिका की धार्मिक प्रवृत्ति है, जिसके चलते वह नित्य एक मन्दिर और आश्रम में जाकर सेवा अर्चना करती है। अभी कुछ समय पहले उसके पिता का भी देहान्त हुआ है। 



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