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शनिवार, 26 मार्च 2022

क्यों लगाया जाता है शीतला सप्तमी पर बासी खाने का भोग जाने रोचक कथा

क्यों लगाया जाता है शीतला सप्तमी पर बासी खाने का भोग जाने रोचक कथा


शीतला माता की उत्पत्ति कैसे हुई


पौराणिक कथा के अनुसार माता शीतला की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा से हुई थी। देवलोक से धरती पर माता शीतला अपने साथ भगवान शिक के पसीने से बने ज्वरासुर को अपना साथी मानकर लाईं थी। तब उनके हाथों में दाल के दाने भी थे। उस समय के राजा विराट ने माता शीतला को अपने राज्य में रहने के लिए स्थान नहीं दिया तो माता क्रोधित हो गई। 

शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी अष्टमी को शीतला माता का पर्व मनाया जाता है।

शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी अष्टमी को शीतला माता का पर्व मनाया जाता है।

इसे बसौड़ या बसौरा भी कहते हैं। शीतला सप्तमी को भोजन बनाकर रखा जाता है और दूसरे दिन उसी भोजन को ही खाया जाता है। इस दौरान विशेष प्रकार का भोजन बनाया जाता है। कहते हैं कि इस ‍देवी की पूजा से चेचक का रोग ठीक होता है। आओ जानते हैं कि कौन है देक्ष शीतला माता।

स्कंद पुराण अनुसार देवी शीतला ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। तथा गर्दभ की सवारी पर अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणुनाशक जल होता है।

स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि यह शक्ति अवतार हैं और भगवान शिव की यह जीवनसंगिनी है। पौराणिक कथा के अनुसार माता शीतला की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा से हुई थी। देवलोक से धरती पर माता शीतला अपने साथ भगवान शिक के पसीने से बने ज्वरासुर को अपना साथी मानकर लाईं थी। तब उनके हाथों में दाल के दाने भी थे। उस समय के राजा विराट ने माता शीतला को अपने राज्य में रहने के लिए स्थान नहीं दिया तो माता क्रोधित हो गई। उस क्रोध की ज्वाला से राजा की प्रजा को लाल लाल दाने निकल आए और लोग गर्मी के मारे मरने लगे। तब राजा विराट ने माता के क्रोध को शांत करने के लिए ठंडा दूध और कच्ची लस्सी उन पर चढ़ाई। तभी से हर साल शीला अष्‍टमी पर लोग मां का आशीर्वाद पाने के लिए ठंडा भोजन माता को चढ़ाने लगे।


स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना स्तोत्र को शीतलाष्टक के नाम से व्यक्त किया गया है। मान्यता है कि शीतलाष्टक स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव जी ने लोक कल्याण हेतु की थी। इस पूजन में शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। इस विशिष्ट उपासना में शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व देवी को भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग बसौड़ा उपयोग में लाया जाता है।

लाखों लोगों की कुलदेवी हैं शीतला माता


गुड़गांव : श्रीशीतला माता मंदिर से शहर की पहचान है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, जाट और गुर्जर समेत कई समाजों में उनकी कुलदेवी के रूप में मान्यता है। यहां पर न केवल स्थानीय बल्कि दूसरे प्रांतों से भी लोग आकर बच्चों के मुंडन व शादी-विवाह करते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार के पास बरगद का पेड़ है। श्रद्धालु अपनी अभिलाषा की पूर्ति के लिए पेड़ से चुन्नी या मौली बांधकर शीतल जल चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं। माता बच्चों की संरक्षिका हैं। स्त्रियां संतान प्राप्ति के लिए माता की पूजा करती हैं। यहां सोमवार के दर्शन करने को विशेष महत्व है। साल भर में करीब 15-16 लाख श्रद्धालु यहां आते हैं। श्रद्धालुओं की संख्या में बेशक हर साल बढ़ोतरी हो रही है लेकिन यहां बच्चों व महिलाओं के लिए मनोरंजन के साधन लगभग सिमट चुके हैं। सिमट चुके साधनों में मिनी सर्कस, म्यूजिकल डांस व लकड़ी के झूले आदि शामिल थे। शीतला माता मंदिर का प्रशासन अब सरकार द्वारा गठित बोर्ड द्वारा किया जाता है। मुख्यमंत्री इस बोर्ड के चेयरमैन होते हैं। इस धार्मिक स्थल पर हर उम्र के पुरुष-महिलाएं दिखती हैं जो लाल रंग का दुपट्टा और मुरमुरा प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह देवी सभी कष्टों से छुटकारा दिलाती हैं।

राजा द्रुपद ने उपहार में दिया था गुड़गांव


गुड़गांव में डीएसडी कॉलेज के पीछे गुरु द्रोणाचार्य का मंदिर है। यह मंदिर सरकारी उपेक्षा का शिकार है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य पांडवों को यहीं पर शस्त्र विद्या की दीक्षा देते थे। पौराणिक मान्यता के अनुसार द्रोणाचार्य और द्रुपद एक साथ बड़े हुए। द्रुपद ने द्रोणाचार्य को मित्रता की खातिर अपना आधा साम्राज्य देने का वादा किया। जब वक्त आया तब द्रोणाचार्य ने उस वादे की याद दिलाई लेकिन द्रुपद ने संपत्ति बांटने से मना कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि एक पंचायत बुलाई गई, जिसके बाद द्रुपद ने द्रोणाचार्य को 18 गांव दिए। इसे हम आज गुड़गांव कहते हैं।

एकलव्य यहीं करते धनुर्विद्या का अभ्यास


सेक्टर-37 खांडसा में एकलव्य का मंदिर है। मान्यता है कि एकलव्य यहीं पर गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास करते थे। गुरु द्रोण ने एकलव्य का भील जाति से होने की वजह से उनका अंगूठा यहीं पर मांग लिया था। राजस्थान, मध्यप्रदेश व देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले भील समुदाय के बीच यह मंदिर आज भी खासा लोकप्रिय है और लोग यहां पर अक्सर आते हैं। गुड़गांव सांस्कृतिक गौरव समिति के अध्यक्ष अजय सिंहल के अनुसार अब यहां पर एकलव्य तीर्थ स्थापित करने की दिशा में काम चल रहा है। करीब 50 करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की जानी है। करीब साढ़े 12 एकड़ जमीन पर एकलव्य मंदिर, धनुर्विद्या केंद्र, सत्संग भवन व खांडव वन के रूप में इसे विकसित किया जाना है।

अब लगते सिर्फ तीन मेले

प्राचीन काल में मेले ही मनोरंजन के साधन होते थे, लेकिन अब इनका प्रचलन धीरे-धीरे समाप्त हो चुका है। शीतला माता मंदिर का चैत्र व कार्तिक मेला, कासन के सावन मेले को छोड़कर लगभग सभी मेले धीरे-धीरे लुप्त हो चुके हैं।

आइए जानते हैं कि आखिर क्यों इस दिन माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और इसके पीछे की मान्यता क्या है...


शीतला सप्तमी पर क्यों लगाया जाता है बासी खाने का भोग? जानिए इसका महत्व

हिन्दू धर्म में हर महीने कई व्रत और त्योहार पड़ते हैं। साथ ही सभी देवी-देवताओं के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हिंदू धर्म में पड़ने वाले सभी व्रत और त्योहारों का अलग-अलग महत्व होता है। दो दिन बाद शीतला अष्टमी का पावन पर्व मनाया जाने वाला है। ये पर्व प्रत्येक वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा अष्टमी भी कहा जाता है। बसौड़ा शीतला माता को समर्पित लोकप्रिय त्योहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार ये त्योहार चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। जो कि होली के आठवें दिन पड़ता है। इस दिन शीतला माता को ठंडा यानी बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों इस दिन माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और इसके पीछे की मान्यता क्या है…

मान्यताओं के अनुसार, शीतला सप्तमी व्रत के दौरान घर में ताजा भोजन नहीं पकाया जाता बल्कि एक दिन पहले बनाए गए भोजन को ही प्रसाद के रूप में खाया जाता है। इस परंपरा के पीछे सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है।


क्यों लगाते हैं बासी भोजन का भोग?


मान्यता है कि शीतला माता को बासी भोजन काफी प्रिय है। शीतला अष्टमी के दिन लोग बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कहा जाता है कि अष्टमी के दिन के घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और उस दिन रात में बने भोजन को ही ग्रहण करने का रिवाज है।
वहीं वैज्ञानिक कारण की बात करें तो चैत्र माह की सप्तमी और अष्टमी तिथि ऋतुओं के संधिकाल पर आती है। यानी शीत ऋतु के जाने का और ग्रीष्म ऋतु के आने का समय है। इन दो ऋतुओं के संधिकाल में खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सर्दी और गर्मी की वजह से कई तरह की मौसमी बीमारियों के होने का खतरा रहता है। इसलिए ठंडा खाना खाने की परंपरा बनाई गई है।


शीतला अष्टमी के दिन घरों में सूर्योदय से पहले की प्रसाद बना कर रख लिया जाता है और माता शीतला की पूजा के बाद दिन भर घर में चूल्हा नहीं जलाता। सूर्योदय से पूर्व बनाए गए प्रसाद को ही लोग ग्रहण करते हैं।

शीतला सप्तमी का महत्व

मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की आराधना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इसके साथ ही रोगों से भी मुक्ति मिलती है, क्योंकि माता शीतला को शीतलता प्रदान करने वाला कहा गया है। 






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