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| पुराणों के अनुसार क्या है खरमास |
पौराणिक ग्रंथों और ज्योतिष के अनुसार:-
क्योकि जब सूर्य देव गुरू ब्रहस्पति की राशियों में होते हें तो अपने गुरू की राशि में होने के कारण सूर्य देव सामान्य ही रहते है। साहायक नही होते। देव गुरू ब्रहस्पति भावनाओ के भी प्रतिक है | देव गुरू ब्रहस्पति कष्ट नहीं दे सकते | शनि और ब्रहस्पति की राशियों में और जब किसी भी ग्रह और राशि पर इनकी दृष्टि होती है तो उस समय और उसमे होने वाले कार्य के लाभ की अवधि भी लम्बी हो जाती है उनका फल भी | सूर्य देव जीवात्मा और उससे जुड़े कार्य का भी प्रतिक है |
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार:-
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार खरमास की कहानी कुछ यूं है। भगवान सूर्यदेव 7 घोड़ों के रथ पर सवार होकर लगातार ब्रह्मांड की परिक्रमा करते रहते हैं। उन्हें कहीं पर भी रुकने की इजाजत नहीं है। उनके रुकते ही जनजीवन भी जो ठहर जाएगा। लेकिन जो घोड़े उनके रथ में जुते होते हैं, वे लगातार चलने व विश्राम न मिलने के कारण भूख-प्यास से बहुत थक जाते हैं। उनकी इस दयनीय दशा को देखकर सूर्यदेव का मन भी द्रवित हो गया। भगवान सूर्यदेव उन्हें एक तालाब किनारे ले गए लेकिन उन्हें तभी यह भी आभास हुआ कि अगर रथ रुका तो अनर्थ हो जाएगा। लेकिन घोड़ों का सौभाग्य कहिए कि तालाब के किनारे दो खर मौजूद थे।
अब भगवान सूर्यदेव घोड़ों को पानी पीने व विश्राम देने के लिए छोड़ देते हैं और खर यानी गधों को अपने रथ में जोड़ लेते हैं। अब घोड़ा, घोड़ा होता है और गधा, गधा। रथ की गति धीमी हो जाती है फिर भी जैसे-तैसे 1 मास का चक्र पूरा होता है, तब तक घोड़ों को भी विश्राम मिल चुका होता हैइस तरह यह क्रम चलता रहता है और हर सौरवर्ष में 1 सौरमास 'खरमास' कहलाता
खरमास अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 16 दिसंबर के आसपास सूर्यदेव के धनु राशि में संक्रमण से शुरू होता है व 14 जनवरी को मकर राशि में संक्रमण न होने तक रहता है। इसी तरह 14 मार्च के आसपास सूर्य, मीन राशि में संक्रमित होते हैं। इस दौरान लगभग सभी मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते
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