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गुरुवार, 29 जून 2023

Bharat: भारत की दरोहर जो कालियादेह महल के नाम से भी जानी जाती है कहाँ पर है जाने उसके इतिहास का एक सच

 

bharat ki  darohar jo kaaliyaadeh mahal ke naam se bhi  jaani  jaati  hai kahan par hai jaane usake itihaas ka ek sach
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कालियादेह महल:-

कालियादेह महल उज्जैन से उत्तर की ओर ६ मील की दूरी पर क्षिप्रा नदी में एक द्वीप के रूप में स्थित है। मुसलमानों के आगमन से पहले यह “ब्रह्मकुण्ड” के नाम से जाना जाता था। इसमें स्नान के लिए घाट बने थे तथा पीछे की तरफ मंदिर था। इस पुराने भवन को पत्थर के एक बाँध से पश्चिम की ओर जोड़ा गया है।

सुल्तान नासिर शाह द्वारा निर्माण :-

मालवा का खिलजी सुल्तान नासिर शाह ने लगभग १५०० ई. में यहाँ एक भवन निर्माण करवाया, जो ग्रीष्म ॠतु में शीतलता प्रदान कर सके। यह भवन वास्तुकला के माण्डु शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें नदी की पानी को कई हौजों में भरकर २० फीट कह ऊँचाई से उत्कीर्ण पत्थरों पर पतली धाराओं के रूप में गिराने का प्रबंध किया गया था। इससे नदी के ऊपर बना चबूतरा शीतल रहता था। भवन में छोटी छतरियाँ तथा अन्य रचनाएँ बाद में, खास तौर पर मुगल काल में जोड़ी गई है। 

ब्रह्मकुंड और सूर्य नारायण का मंदिर और कालियादेह महल :-

भैरवगढ़ के किले के निकट से ही इस भव्य महल आरंभ होता है जिसका नाम कालियादह महल है। 'अवन्ति महात्म्य' में लिखे अनुसार यहां ब्रह्मकुंड और सूर्य नारायण का मंदिर था। कालियादह नाम पीछे का है। इस स्थान के आसपास तथा कुशकों में कुछ मूर्तियां हैं। पत्थर पर जिस प्रकार की खुदाई का काम यत्र-तत्र दिखाई देता है, उससे पौराणिक कथन की सत्यता मालूम होती है। 

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होशंगशाह और गुजरात के अहमदशाह की लड़ाई सन्‌ 48 के समय मिलता है। भवन के एक भग्न शिलालेख से ज्ञात होता है कि यह स्थान (सन्‌ 458) में मुहम्मद खिलजी के जमाने में निर्माण किया गया। तवारीख शाही में लिखा है कि सन्‌ 946 हिजरी सन्‌ 572 में जब शेरशाह ने यहां अपना डेरा डाला था, उस समय सिकंदर खां ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। 

सम्राट अकबर का भी इस महल से जुड़ा इतिहास:-

सम्राट अकबर ने भी इस महल की सुंदरता पर मुग्ध होकर (सन्‌ 599) में अपना मुकाम यहां किया था। कुशक के एक पत्थर पर उनके अंकित शिलालेख में लिखा है- 'बतारीख सन्‌ 44 साल बाद इलाही मुताबिक सन्‌ 000 हिजरी रायात जफर आं अज्म तस्खीर दकन कर्दव ईजा ऊबूर उल्फाद।'

अंग्रेजो की डायरी में इस महल की जानकारी :-

सम्राट जहांगीर के साथ सन्‌ 66 में सर टॉमस रो ने भी इस जल-महल में निवास किया था। अपनी डायरी में सर टॉमस ने भी इसकी सुंदरता का वर्णन किया है।

दूसरी कुशक की दीवार पर एक जगह खुदा हुआ है, जो कि हिजरी सन्‌ 03। तथा ई.सं. 68 का है- 'बहुक्म शाह जहां साख्त ई दरे अशस्त गाह,

हसन बउदब जहांगीर अकबर शाह; बहिश्त रूए जमीं याफ्त अक्ल तारीखश, कि सर वराई जहां-रास्त मंजिले दिलख्वाह।' ।।. । अर्थात- ऐ हसन! अशरतगाह का दरवाजा सारी दुनिया के फतह करने वाले शहंशाह अकबर के जमाने में उनकी आज्ञा से बना था। 

बादशाह जहांगीर के जीवन काल से जुडी इस महल की बातें :-

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इसी तरह बादशाह जहांगीर को यह महल बहुत ही पसंद था। वह अक्सर इस महल में आकर रहता था। यहां के जल-प्रवाह, जल के 52 कुंडों की विचित्र कारीगरी की शोभा से मन को प्रसन्न किया करता था। जहांगीर की यह बात प्रसिद्ध है कि वह कालियादह महल में रहते हुए  नाव में बैठकर उज्जैन के जंगलों में रहने वाले महान तत्वज्ञ योगी जदरूप स्वामी से मिलने जाया करता था तथा ज्ञान-पिपासा को शांतिपूर्ण चर्चा से शमन किया करता था। अपनी स्वलिखित 'तुजुक-ए-जहांगीरी' नामक पुस्तक में वह लिखता है- "2 असफन्दार (माघ सुदी 5 सं. 973) को नाव में बैठकर मैंने कालियादह से प्रयाण किया। यह बात कई बार सुनी गई थी कि 'जदरूप' नामक एक तपस्वी संन्यासी कई सालों से उज्जैन के जंगलों में साधना करता है। मुझे उससे मिलने की कई सालों से इच्छा थी। जब मैं आगरे में था, तब मैंने सोचा कि उसे बुलाकर मिलूं, परंतु उसे मैं तकलीफ नहीं देना चाहता था। अब उज्जैन पहुंचकर किश्ती से उतरकर आधा पाव कोस पैदल चलकर उसे देखने को गया।' 

इसके बाद एक जगह बादशाह ने फिर लिखा है-

"गुजरात के लौटकर 29 आवान (अगहन सुदी 4 सं. 675) को फिर मैं जदरूप से मिला, जो हिन्दू धर्म के तपस्वियों में से हैं और जिसका हाल पिछले पन्नों में लिखा जा चुका है, मिलकर कालियादह गया।' इस प्रकार अकबर और जहांगीर ने कई बार इस महल में रहकर शांति की समाराधना की। पिंडारियों के जमाने में यह महल नष्ट हो गया था। बाद में सन्‌ 700 में पुन: जल-यंत्रों और कुशकों की मरम्मत करवाई गई। 

माधवराव सिंधिया और कालियादेह महल:-

इसके बाद सन्‌ 786 में ग्वालियर राज्य के मध्य भारतीय विभाग के सरसूबा सर माइकल फिलोज ने इसका जीर्णोद्धार करवा अपने रहने के लिए पसंद किया। बाद में बीच में किसी की दृष्टि इस ओर नहीं गई। हां, सन्‌ 920 में प्रसिद्ध नीति-निपुण महाराजा स्व. माधवराव सिंधिया की नजर इस महल पर पड़ी। स्व. महाराजा को उज्जैन बहुत प्यारी जगह लगती थी। उसमें कालियादह महल जैसा मनोहारी स्थान उन्हें क्यों न पसंद होता? 

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