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शनिवार, 28 मई 2022

Vat Savitri Vrat 2022 Par 30 Saal Baad दो अद्भुत शुभ संयोग-सोमवती अमावस्या के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग

Vat Savitri Vrat 2022 Par 30 Saal Baad दो अद्भुत शुभ संयोग-सोमवती अमावस्या  के साथ  सर्वार्थ सिद्धि योग

Vat Savitri Vrat 2022 Par 30 Saal Baad दो अद्भुत शुभ संयोग-सोमवती अमावस्या  के साथ  सर्वार्थ सिद्धि योग
Vat Savitri Vrat 2022 Par 30 Saal Baad दो अद्भुत शुभ संयोग-सोमवती अमावस्या  के साथ  सर्वार्थ सिद्धि योग


हिन्दू पंचांग को देखें तो वर्ष 2022 में ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 29 मई, रविवार की दोपहर 02:56 से प्रारंभ होगी और इसकी समाप्ति अगले दिन यानी 30 मई, सोमवार की शाम 05 बजे पर होगी। इसलिए इस वर्ष वट सावित्री व्रत 30 मई, सोमवार के दिन रखा जाएगा। इस दौरान महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए, उनसे अपने पति की लंबी आयु और अपने वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करेंगी। 

वट सावित्री व्रत 2022 शुभ मुहूर्त

ज्येष्ठ अमावस्या व्रत : 30 मई, 2022 (सोमवार)

मुहूर्त- 

अमावस्या तिथि प्रारम्भ - मई 29, 2022 को 02:54 P.M. बजे

अमावस्या तिथि समाप्त - मई 30, 2022 को 04:59 P.M. बजे

वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व

इस व्रत को लेकर शास्त्रों में कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। उसमें से एक के अनुसार वट वृक्ष के नीचे ही अपने कठोर तप से पतिव्रता सावित्री ने अपने पति सत्यवान को दोबारा जीवित किया था। जबकि एक अन्य मान्यता की मानें तो भगवान शिव के वरदान से ऋषि मार्कण्डेय को वट वृक्ष में भगवान विष्णु के बाल मुकुंद अवतार के दर्शन हुए थे। उसी दिन से वट वृक्ष की पूजा किये जाने का विधान है।

इस वर्ष वट सावित्री व्रत के दिन कुछ शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इसलिए इस वर्ष इस व्रत का महत्व और अधिक बढ़ गया है। 

वट सावित्री व्रत पर बना ये बड़ा संयोग 

वर्ष 2022 में वट सावित्री व्रत के दिन शनि जयंती व सोमवती अमावस्या का सुन्दर व शुभ संयोग बनेगा। हिन्दू धर्म के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन दान-पुण्य, स्नान, पितरों का पूजन, यज्ञ-हवन अधिक करने का विधान है। 

इसके अलावा इस दिन शनि जयंती का संयोग बनने से इसी दिन शनिदेव की पूजा भी की जाएगी। खासतोर से वो जातक जो शनिदोष, शनि साढ़े साती या ढैया  से पीड़ित हो उनके लिए यह दिन विशेष रहने वाला है। 

वट सावित्री व्रत के दिन ये राशियां ज़रूर करें शनि पूजन

अप्रैल में शनि देव ने वर्षों बाद अपनी स्वराशि कुम्भ में गोचर किया था। जिससे मकर राशि, कुंभ राशि और मीन राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव शुरू हुआ था। ऐसे में वर्तमान में ये तीन राशि के जातक शनि की साढ़ेसाती से खासा पीड़ित रहने वाले हैं। 

इसके अलावा शनि के गोचर के बाद कर्क राशि व वृश्चिक राशि पर शनि ढैय्या शुरू हुई। 

ऐसे में इन पाँचों राशि के जातकों को शनि के हर प्रकार के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए शनि जयंती के दिन शनि शान्ति पूजन व अनुष्ठान करना उचित रहेगा। 

वट सावित्री व्रत पर इन शुभ योग का भी होगा निर्माण

शनि जयंती और सोमवती अमावस्या के अलावा भी वट सावित्री व्रत दो शुभ योग में रखा जाएगा। जिसमें पहला योग सुकर्मा योग होगा जो 29 मई की रात्रि 10:53 से शुरू होकर अगले दिन 30 मई की रात्रि 11:37 तक रहेगा। फिर उसके बाद 30 मई को ही धृति योग लग जाएगा, जो 1 जून की देर रात तक रहेगा।  

वैदिक ज्योतिष में ये दोनों ही योग बहुत शुभ होते हैं। क्योंकि जहाँ सुकर्मा योग में किये गए हर प्रकार के मांगलिक कार्य सफल होते हैं, तो वहीं धृति योग के दौरान किये गए सभी कार्य बड़े लाभदायक साबित होते हैं।

वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री

वट सावित्री व्रत के लिए पूजन सामग्री कुछ इस प्रकार है:-

सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां या चित्र

वट सावित्रि पूजा सामग्री 

सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां

बांस का पंखा

लाल कलावा

धूप

दीप

घी

फल

पुष्प

रोली

सुहाग का सामान

पूडियां

बरगद का फल

जल से भरा कलश

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

व्रत वाले दिन व्रती महिलाएं प्रातःकाल उठकर घर की अच्छी तरह सफाई करें। 

इसके बाद स्वयं नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें और सुहागन के वस्त्र धारण करें। 

इसके बाद घर में गंगाजल का छिड़काव कर, घर को पवित्र करें। 

अब बांस की एक टोकरी में 7 प्रकार के अनाजों को भरकर उसमे ब्रह्मा जी की मूर्ति या प्रतिमा की स्थापना करें।

अब ब्रह्मा जी के वाम पार्श्व में देवी सावित्री को स्थापित करें।

अब ठीक इसी प्रकार एक दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की एक-साथ मूर्तियों या चित्रों की स्थापना करें। 

अब इन दोनों टोकरियों को अपने साथ किसी वट वृक्ष के नीचे ले जाकर पूजन के लिए रख दें। 

अब वट वृक्ष का पूजन करते हुए पहले ब्रह्मा जी और फिर सावित्री का विधि-विधान पूजन करें।

इसके बाद सावित्री और सत्यवान की पूजा-आराधना करते हुए वट वृक्ष की जड़ में कलश से पानी अर्पित करें। 

अब एक थाल में लाया गया पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ काला चना, फूल तथा धूप का भी इस्तेमाल कर वट वृक्ष का पूजन करें। 

इसके बाद जल से वट वृक्ष को सींचकर, कच्चा धागा उसके तने के चारों ओर लपेटते हुए तीन बार वृक्ष की परिक्रमा करें।

परिक्रमा के बाद बरगद वृक्ष के पत्तों के गहने बनाकर उन्हें पहने और फिर वट सावित्री की कथा सुनें।

कथा सुनने के पश्चात भीगे हुए चनों का बायना निकालें और फिर उस पर अपनी श्रद्धानुसार कोई भेट रखकर अपनी सास या सास समान किसी महिला को दें और उनसे आशीर्वाद लें। 

इसके साथ ही पूजा समाप्ति के बाद किसी ब्राह्मणों को भी वस्त्र, फल व अन्य दान की वस्तुएं बांस के किसी पात्र में रखकर दें और उनसे भी आशीर्वाद लें।

पूजा- विधि

इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।

घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।

इस पावन दिन वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है।

वट वृक्ष के नीचे सावित्रि और सत्यवान की मूर्ति को रखें।

इसके बाद मूर्ति और वृक्ष पर जल अर्पित करें।

इसके बाद सभी पूजन सामग्री अर्पित करें।

लाल कलावा को वृक्ष में सात बार परिक्रमा करते हुए बांध दें।

इस दिन व्रत कथा भी सुनें।

इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

वट सावित्री अमावस्या पूजा- विधि:

इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।

घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।

इस पावन दिन वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है।

वट वृक्ष के नीचे सावित्रि और सत्यवान की मूर्ति को रखें।

इसके बाद मूर्ति और वृक्ष पर जल अर्पित करें।

इसके बाद सभी पूजन सामग्री अर्पित करें।

लाल कलावा को वृक्ष में सात बार परिक्रमा करते हुए बांध दें।

इस दिन व्रत कथा भी सुनें।

इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

वट सावित्री व्रत की कथा:

राजर्षि अश्वपति की एक संतान थी, जिसका नाम सावित्री था। सावित्री का विवाह अश्वपति के पुत्र सत्यवान से हुआ था। नारद जी ने अश्वपति को सत्यवान के गुण और धर्मात्मा होने के बारे में बताया था। लेकिन उन्हें यह भी बताया था कि सत्यवान की मृत्यु विवाह 1 साल बाद ही मृत्यु हो जाएगी। पिता ने सावित्री को काफी समझाया लेकिन उन्होंने कहा कि वह सिर्फ़ सत्यवान से ही विवाह करेंगी और किसी से नहीं। सत्यवान अपने माता-पिता के साथ वन में रहते थे। विवाह के बाद सावित्री भी उनके साथ में रहने लगीं। सत्यवान की मृत्यु का समय पहले ही बता दिया था इसलिए सावित्री पहले से ही उपवास करने लगी। जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया तो वह लकड़ी काटने के लिए जंगल में जाने लगा। सावित्री ने कहा कि आपके साथ जंगल में मैं भी जाऊंगी। जंगल में जैसे ही सत्यवान पेड़ पर चढ़ने लगा तो उनके सिर पर तेज दर्द हुआ और वह वृक्ष से आकर नीचे सावित्री की गोद में सिर रख कर लेट गए। कुछ समय बाद सावित्री ने देखा कि यमराज के दूत सत्यवान को लेने आए हैं। सावित्री पीछे पीछे यमराज के चलने लगी। जब यमराज ने देखा कि उनके पीछे कोई आ रहा है तो उन्होंने सावित्री को रोका और कहा कि तुम्हारा साथ सत्यवान तक धरती पर था अब सत्यवान को अपना सफर अकेले तय करना है। सावित्री ने कहा मेरा पति जहां जाएगा मैं वही उनके पीछे जाऊंगी, यही धर्म है। यमराज सावित्री के पतिव्रता धर्म से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने एक वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी। यमराज ने वर देकर आगे बढ़े। फिर से सावित्री पीछे आ गई है। फिर एक और वरदान मांगने को कहा तब सावित्री ने कहा, "मैं चाहती हूं मेरे ससुर का खोया हुआ राजपाट वापस मिल जाए। यह वरदान देकर यमराज आगे बढ़े। इसके बाद फिर वे सावित्री पीछे चल पड़ीं। तब यमराज ने सावित्री को एक और वर मांगने के लिए कहां तब उन्होंने कहा कि मुझे सत्यवान के 100 पुत्रों का वर दें। यमराज ने यह वरदान देकर सत्यवान के प्राण लौटा दिए। सावित्री लौटकर वृक्ष के पास आई और देखा कि सत्यवान जीवित हो गए हैं। ऐसे में इस दिन पति की लंबी आयु, सुख, शांति, वैभव, यश, ऐश्वर्य के लिए यह व्रत रखना चाहिए। 


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