भाद्रपद की कुशोत्पाटिनी अमावस्या, जानें इस खास दिन किए जाने वाले धार्मिक कर्म और महत्व के बारे में
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कुशोत्पाटिनी अमावस्या मुख्यत: पूर्वान्ह में मानी जाती है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
भाद्रपद अमावस्या मुहूर्त के लिए
अगस्त 26, 2022 को 12:26:09 से अमावस्या
आरम्भअगस्त 27, 2022 को 13:48:43 पर अमावस्या समाप्त
कुशोत्पाटनी अमावस्या (27 अगस्त, शनिवार)
भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि कुशोत्पाटिनी (या कुशाग्रहणी) अमावस के नाम हो से जानी जाती है। इसदिन कुशासञ्चय करने से वर्षभर उसकी शुद्धता रहती है। जिस कुश का मूल सुतीक्षण हो, जिसमें पत्ती हो, अग्रभाग कटा न हो और हरा हो, वह देव ) तथा पितृ-दोनों कार्यों के लिए उपयुक्त होता है। यह तिथि पूर्वाह्णव्यापिनी तथा दिन मा के द्वितीय प्रहर व्याप्त अमावस ली जाती है। यथा
मासे नभस्यमावस्या तस्यां दुर्भीच्चयो मतः।
अयातयामास्ते दर्भा विनियोज्याः पुनः पुनः ।।
एवं च, 'इयममावस्या द्वितीयप्रहरव्यापिनी ग्राह्या ।।' (वर्षकृत्य)
स्कन्दपुराणानुसार भी 'दर्भाणां सञ्चये सङ्गवःकाल ईरितः । अर्थात् कुशों के - संचय में संगवकाल (दिन के पाँच भागों में दूसरा भाग) व्यापिनी अमावस्या शुभ कही का गयी है।
आगामी वर्ष भाद्रपद अमावस 27 सितम्बर, शनिवार, 2022 ई. को द्वितीय प्रहर (8पं. 38र्मि. से 11र्ष--12मिं. तक) को व्याप्त हो रही है। अतएव भाद्र. अमावस्या तारा द्वितीय प्रहर व्यापिनी होने से कुशोत्पाटन का कार्य 27 अगस्त, 2022 ई., शनिवार को वाले ही करना प्रशस्त होगा। इस तिथि को दर्भस्थल पर जाकर पूर्व या उत्तराभिमुख बैठकर निम्न मन्त्र पढ़कर और 'हुँ फट्' कहकर दाहिने हाथ से एक बार में कुश उखाड़े | विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज । नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव ।।
कुशोत्पाटिनी अमावस्या का महत्व
ऐसी मान्यता है कि इस दिन कुशा नामक घास को उखाड़ने से यह वर्ष भर कार्य करती है तथा पूजा पाठ कर्म कांड सभी शुभ कार्यों में आचमन में या जाप आदि करने के लिए कुशा इसी अमावस्या के दिन उखाड़ कर लाई जाती है। हिन्दू धर्म में कुश के बिना किसी भी पूजा को सफल नहीं माना जाता है। इसलिए इसे कुशग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा जाता है। यदि भाद्रपद माह में सोमवती अमावस्या पड़े तो इस कुशा का उपयोग 12 सालों तक किया जा सकता है। किसी भी पूजन के अवसर पर पुरोहित यजमान को अनामिका उंगली में कुश की बनी पवित्री पहनाते हैं।
संबंधित अन्य नाम कुशाग्रहणी अमावस्या
सुरुआत तिथि भाद्रपद कृष्ण अमावस्या
कारण वर्ष भर उपयोग के लिए कुशा एकत्र करने हेतु।
उत्सव विधि पूजा, भजन-कीर्तन, कथा।
कुशा उत्पत्ति कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय हिरण्यकश्यप के बड़े भाई हिरण्याक्ष ने धरती का अपहरण कर लिया। हिरण्याक्ष पृथ्वी को पताल लोक ले गया राक्षस राज इतना शक्तिशाली था कि उसका कोई विरोध तक ना कर सका। तब धरती को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया तथा हिरण्याक्ष का वध कर धरती को मुक्त कराया। तथा पृथ्वी को पुनः अपनी पूर्व अवस्था में स्थापना किया।
पृथ्वी की स्थापना करने के बाद भगवान वाराह बहुत भीग गए थे जिसके कारण उन्होंने अपने शरीर को बहुत तेज झटका, झटकने से उनके रोए टूटकर धरती पर जा गिरे जिससे कुशा की उत्पत्ति हुई। कुशा की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु तथा शीर्ष भाग में भगवान शिव विराजते हैं।
मान्यातानुसार कुशा को किसी साफ-सुथरे जल श्रोत अथवा पोखर से प्राप्त करना चाहिए। स्वयं को पूर्व की दिशा की तरफ मुंह करना चाहिए तथा अपने हाथ से कुशा को धीरे-धीरे उखाड़ना चाहिए है। ध्यान रहे कि यह साबुत ही रहे ऊपर की नोक भी ना टूटने पाए।
कुशा का चिकित्सा में प्रयोग
कुशा का प्रयोग प्राचीन काल से चिकित्सा एवं धार्मिक कार्यों में किए जाने का वर्णन है। मूत्रविरेचनीय तथा स्तन्यजनन आदि महाकषायों में कुश के प्रयोग का वर्णन मिलता है।
कुशा के अन्य नाम
कुश का वानस्पतिक नाम डेस्मोस्टेकिया बाईपिन्नेटा है। कुशा को अंग्रेजी में सैक्रिफिशियल ग्रास कहते हैं. भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों में कई नामों से कुशा को कुश, सूच्याग्र, पवित्र, यज्ञभूषण, कुस, दर्भाईपुल, दर्भा तथा हल्फा ग्रास के नाम से भी जाना जाता है।
आवृत्ति वार्षिक
समय 1 दिन
सुरुआत तिथि भाद्रपद कृष्ण अमावस्या
समाप्ति तिथि भाद्रपद कृष्ण अमावस्या
महीना अगस्त / सितंबर
कारण वर्ष भर उपयोग के लिए कुशा एकत्र करने हेतु।
उत्सव विधि पूजा, भजन-कीर्तन, कथा।
महत्वपूर्ण जगह घर, तालाब, झरने, नदी, जल श्रोत।
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| कुशोत्पाटिनी अमावस्या : जानें इस खास दिन किए जाने वाले धार्मिक कर्म और महत्व के बारे में |
कुशोत्पाटिनी अमावस्या का महत्व :-
माना जाता है कि इस दिन कुशा नामक घास को उखाड़ने से यह वर्ष भर कार्य करती है मान्यता है कि इस दिन पूजा पाठ कर्म कांड सभी शुभ कार्यों में आचमन में या जाप आदि करने के लिए कुशा इसी अमावस्या के दिन उखाड़ कर लाई जाती है। अगर यह अमावस्या सोमवार को पड रही है तो इस दिन उखाड़ कर लाई गई घांस पूरे 12 वर्षों तक कार्य करती है। जिसका आप कई तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं नीचे कुछ उपाय बताए गए हैं कि किस तरह से इस कुशा का इस्तेमाल अपने विभिन्न कार्यों के लिए कर सकते हैं।
कुशा की उत्पत्ति कैसे हुई :-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष ने धरती का अपहरण कर लिया। वह धरती को पताल लोक ले गया वह इतना शक्तिशाली था कि उससे कोई भिड़ना नहीं चाहता था। तब धरती को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया व हिरण्याक्ष का वध कर धरती को पताल लोक से मुक्त कराया वह पुनः धरती की अपनी जगह पर स्थापना की कहते हैं की स्थापना करने के बाद भगवान वाराह बहुत भीग गए थे जिसके कारण उन्होंने अपने शरीर को बहुत तेज झटका झटकने से उनके रोए टूटकर धरती पर जा गिरे जिससे कुशा की उत्पत्ति हुई। कुशा की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु, तथा शीर्ष भाव में शिवजी विराजित हैं।
कुशा को कैसे प्राप्त करें :-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुशा को किसी जल या पोखर जो साफ सुथरा हो वहां से प्राप्त करें। आपको पूर्व की दिशा की तरफ मुंह करना है वह अपने हाथ से धीरे-धीरे उखाडना है। ध्यान रहे यह साबूत रहे ऊपर की नोक ना टूटे। उखाड़ दे वक्त इस मंत्र का जाप करना है- ॐ हूं फट् ।
कुशा के कुछ चमत्कारी प्रयोग :-
1.अगर आपकी कुंडली में केतु की महादशा चल रही है व केतु शुभ फल नहीं दे रहा है तो जो कुशा आप इस दिन उखाड़ कर लाए हैं उसका आसन बना ले व आसन पर बैठकर केतु के मंत्रों का माला से जाप करें या शिवजी के मंत्रों का जाप करें ऐसा करने से आपके अशुभ केतु शांत होंगे।
2.अगर ग्रहण सूतक में अपने घर के वस्तुओं में अगर इस कुशा को डाल देंगे तो वह सामान खराब नहीं होगा।
3.अगर आप बीमार हैं या आपके आसपास कोई बीमार हो गया है बीमारी नहीं जा रही है तो कुशा को रात भर जल में भिगोकर रख दें वह इसका शरबत बना कर बीमार व्यक्ति को पिलाएं इससे उसके स्वास्थ्य में जल्द से सुधार होगा।
4.बीमारी में कुशा की जड़ को रोज पानी में डालकर शिवजी का अभिषेक करें इससे भी स्वास्थ्य में लाभ होगा।
5.कुशा को हाथ में लेकर दान पुण्य करने से दान का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
6.इस दिन पितरों के मोक्ष के लिए पिंडदान आदि के लिए इस कुशा का प्रयोग किया जाता है।


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