G-B7QRPMNW6J Dhanteras 2023: धनतेरस पर क्यों जलाए जाते हैं 13 दीये और एक दिया यम का रहस्य जान हो जायेंगे हैरान
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Dhanteras 2023: धनतेरस पर क्यों जलाए जाते हैं 13 दीये और एक दिया यम का रहस्य जान हो जायेंगे हैरान

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Dhanteras 2023: धनतेरस पर क्यों जलाए जाते हैं 13 दीये और एक दिया यम का रहस्य जान हो जायेंगे हैरान

Why are 13 lamps lit on Dhanteras and the secret of one lamp Yama
Why are 13 lamps lit on Dhanteras and the secret of one lamp Yama

13 दीये और एक दिया यम का रहस्य

धनतेरस और दीवाली को 13 दीपक का महत्त्व जान हैरान रह जायेंगे इन 13 दीपकों से आप के परिवार, व्यापार, कार्य में आने वाली नकारात्मक ऊर्जा और बुरी आत्माओं से आप की रक्षा करते हैं.

धनतेरस,दीवाली का त्यौहार आते ही लोगों में खरीददारी को लेकर होड़ मच जाती है. सोना,चांदी, हीरा, रत्न, जमीन,मकान, बर्तन, कपड़े, सहित वाहन जैसी तमाम जरूरी वस्तुयें लोग लेते हैं इस दिन की खरीददारी काफी शुभ और लाभदायी होती है. लेकिन इससे भी लाभदाई होती है धनतेरस और दीपावली के दिन होने वाली पूजा और इस दिन जलाए जाने वाले 13 दिए जो स्वास्थ्य जीवन सुखद परिवार और धनलभ जैसे तमाम महत्पूर्ण फल प्रदान करतें हैं. इस दिन यमदेव को दीपक दिखाने से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु दोष भी दूर होता है.

यह 13 दीये नकारात्मक ऊर्जा और बुरी आत्माओं से आप की रक्षा करते हैं. दयालुता और पवित्रता का प्रतीक माने जाने वाले यह दीपक आप के जीवन में उत्साह, राग, रंग सहित कई तरह के विशेष फल की प्राप्ति करवाते हैं. इसलिए इनके महत्त्व के बारे में जानते हैं.

जानें 13 दीयों का महत्व

#1. धनतेरस की संध्या पहला दिया यमदेव के नाम का होता है जो आप के परिवार को अकाल मृत्यु के दोष से मुक्ति दिलाता है इस दिन आटे से बना चौमुखी दिया घर के दक्षिण छोर में रखना चहिए.

#2. दूसरा दिया घी से जलाकर अपने घर के पूजा मंदिर या किसी अन्य उपयुक्त स्थान के सामने रखना चाहिए इससे आप के द्वारा भगवान से मांगी गई कामना पूर्ण होती है.

#3. तीसरा दिया माता लक्ष्मी को स्मरण कर के उनकी प्रतिमा के सामने जलाएं धन, धान्य, में वृद्धि होगी और घर में समृद्धि होगी.

#4. चौथा दिया माता तुलसी को उनके पौधे के निकट जलाना चहिए. ऐसा करने से आपके घर में रहने वाला परिवार शांति और खुशहाल रहेगा और पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा.

#5. पांचवां दिया घर के मुख्य के सामने रखना चाहिए. इससे घर में आने वाली बुरी आत्माओं से रक्षा होती और घर में नकारात्मक शक्तियां का प्रवेश नही होता.

#6. छठा दिया पारंपरिक रूप से पीपल के पेड़ के नीचे रखा जाता है. इसे अत्यंत भाग्यशाली माना जाता है मान्यता है कि इसे सरसों के तेल से जलाया जाना चाहिए. यह धन और स्वास्थ्य संकटों से मुक्ति का संकेत देता है.

#7. सातवां दिया पास के मंदिर या बाहर जहां आप पूजा करने जातें हो वहां जलाएं इससे घर में खुशहाली आती है

#8. आठवां दिया कूड़ेदान के पास जलाएं इससे नकारात्मक ऊर्जा और बुरी आत्माओं से बचने से मदद मिलती है और घर में स्वच्छता का वास होता है.

#9. नौवां दिया घर के शौंचालय के बाहर जलाए इससे आर के जीवन में सकारात्मक उर्जा का संचार होगा और स्मृद्धि आयेगी.

#10. दसवां दिया अपने घर की छत में रखें यह दीपक नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा का प्रतीक है. यह बुरी शक्तियों से आप की रक्षा करता है.

#11. ग्यारहवां दिया घर की किसी भी खिड़की पर रखें यह बुरी ऊर्जा से लड़ने का काम करता है.

#12. बारहवां दिया अपने घर के सबसे ऊपरी मंजिल या स्थान पर रखें जो आपके स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है.

#13. तेरहवां दिया घर के समीप चौराहे में रखें यह घर आने वाली स्मृद्धि का परिचायक है. जो आपके जीवन में अच्छी ऊर्जा लाने में सहयोगी होता है.

धनतेरस के दिन क्यों जलाते हैं यम का दीपक ?

Why are 13 lamps lit on Dhanteras and the secret of one lamp Yama
Why are 13 lamps lit on Dhanteras and the secret of one lamp Yam
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देश के अधिकांश भागों में 'यम' के नाम पर दीपदान की परंपरा है। दीपावली के दो दिन पूर्व धन्वं‍तरि-त्रयोदशी के सायंकाल मिट्टी का कोरा दीपक लेते हैं। उसमें तिल का तेल डालकर नवीन रूई की बत्ती रखते हैं और फिर उसे प्रकाशित कर, दक्षिण की तरह मुंह करके मृत्यु के देवता यम को समर्पित करते हैं। तत्पश्चात इसे दरवाजे के बगल में अनाज की ढेरी पर रख देते हैं। प्रयास यह रहता है कि यह रातभर जलता रहे, बुझे नहीं। क्यों प्रकाशित करते हैं यह दीपक? क्या है इसका रहस्य? इस संबंध में एक रोचक और सुन्दर पुराण कथा मिलती है।

कहते हैं, बहुत पहले हंसराज नामक एक प्रतापी राजा था। एक बार वह अपने मित्रों, सैनिकों और अंगरक्षकों के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। संयोग से राजा सबसे बिछुड़कर अकेला रह गया और भटकते हुए एक अन्य राजा हेमराज के राज्य में पहुंच गया।

हेमराज ने थके-हारे हंसराज का भव्य स्वागत किया। उसी रात हेमराज के यहां पुत्र जन्म हुआ। इस खुशी के अवसर पर हेमराज ने राजकीय उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आग्रह के साथ हंसराज को कुछ दिनों के लिए अपने यहां रोक लिया। बच्चे के छठवीं के दिन एक विचित्र घटना घटी। पूजा के समय देवी प्रकट हुई और बोली- आज इस शिशु की जो इतनी खुशियां मनाई जा रही हैं, यह अपने विवाह के चौथे दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। 

इस भविष्यवाणी से सारे राज्य में शोक छा गया। हेमराज और उसके परिजनों पर तो वज्रपात ही हो गया। सबके सब स्तब्ध रह गए। इस शोक के समय हंसराज ने राजा हेमराज और उसके परिवार को ढांढस दिया- मित्र, आप तनिक भी विचलित न हों। इस बालक की मैं रक्षा करूंगा। संसार की कोई भी शक्ति इसका बाल बांका नहीं कर सकेगी।

हंसराज ने यमुना के किनारे एक भूमिगत किला बनवाया और उसी के अंदर राजकुमार के पालन-पोषण की व्यवस्था कराई। इसके अतिरिक्त राजकुमार की प्राणरक्षा के लिए हंसराज ने सुयोग्य ब्राह्मणों से अनेक तांत्रिक अनुष्ठान, यज्ञ, मंत्रजाप आदि की भी व्यवस्था करा रखी थी। धीर-धीरे राजकुमार युवा हुआ। उसकी सुंदरता एवं ते‍जस्विता की चर्चा सर्वत्र फैल गई। राजा हंसराज के कहने से हेमराज ने राजकुमार का विवाह भी कर दिया। जिस राजकुमारी से युवराज का विवाह हुआ था, वह साक्षात लक्ष्मी लगती थी। ऐसी सुंदर वर-वधू की जोड़ी जीवन में किसी ने न देखी थी।

विधि का विधान... विवाह के ठीक चौथे दिन यम के दूत राजकुमार के प्राण हरण करने आ पहुंचे। अभी राज्य में मांगलिक समारोह ही चल रहा था। राजपरिवार और प्रजाजन खुशियां मनाने में मग्न थे। राजकुमार और राजकुमारी की छवि देखकर यमदूत भी विचलित हो उठे, किंतु राजकुमार के प्राणहरण का अप्रिय कार्य उन्हें करना ही पड़ा। 

यमदूत जिस समय राजकुमार के प्राण लेकर चले, उस समय ऐसा हाहाकार मचा और दारुण दृश्य उपस्थित हुआ जिससे द्रवित होकर दूत भी स्वयं रोने लगे।

इस घटना के कुछ समय पश्चात एक दिन यमराज ने प्रसन्न मुद्रा में अपने दूतों से पूछा- दूतों! तुम सब अनंत काल से पृथ्वी के जीवों का प्राणहरण करते आ रहे हो, क्या तुम्हें कभी किसी जीव पर दया आई है और मन में यह विचार उठा है कि इसे छोड़ देना चाहिए? 

यम के दूत एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। यमराज ने उनके संकोच को भांपकर उन्हें उत्साहित किया- झिझको मत, अगर ऐसा प्रसंग आया हो, तो निर्भय होकर बताओ।

इस पर एक दूत ने सिर झुकाकर निवेदन किया- मृत्युदेव, ऐसे प्रसंग तो कम ही आए हैं किंतु एक घटना अवश्य हुई है जिसकी स्मृति मुझे आज भी विह्वल कर देती है। यह कहते हुए दूत ने हेमराज के पुत्र के प्राणहरण की घटना सुना दी। इस दु:खद प्रसंग से यमराज भी विचलित हो उठे। इसे लक्ष्य करके दूत बोला- नाथ! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे इस प्रकार की अकाल मृत्यु से प्राणियों को छुटकारा मिल जाए?

इस पर यमराज ने कहा- जीवन और मृत्यु सृष्टि का अटल नियम है तथा इसे बदला नहीं जा सकता किंतु धनतेरस को पूरे दिन का व्रत और यमुना में स्नान कर धन्वंतरि और यम का पूजन-दर्शन अकाल मृत्यु से बचाव कर सकता है। यदि यह संभव न हो तो भी संध्या के समय घर के प्रवेश द्वार पर यम के नाम का एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। इससे असामयिक मृत्यु और रोग से मुक्त जीवन प्राप्त किया जा सकता है।

इसके पश्चात से ही धनतेरस के दिन धन्वंतरि के पूजन और प्रवेश द्वार पर यम दीपक प्रज्वलित करने की परंपरा है। 

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