Breaking

✨ "विपरीत परिस्थितियां कुछ लोगों को तोड़ देती हैं, और कुछ लोगों को रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार करती हैं" — अक्षय जमदग्नि ... 🌟 "आपका भविष्य आपके आज के फैसलों पर निर्भर करता है, ग्रहों की चाल को अपने पुरुषार्थ से बदलें" ... 🚀 "वास्तु सुधारेगा परिवेश, और विचार बदलेंगे आपका भविष्य" ... 💎 "Astro Vastu Kosh: जहाँ ज्ञान, ऊर्जा और प्रेरणा मिलते हैं" ...

Astro Vastu Kosh - ज्योतिष एवं वास्तु

सोमवार, 10 जुलाई 2023

Vasu कौन है वसु जाने इनका जीवन परिचय -उत्पत्ति की कथा-पराक्रम- वरदान एवं श्राप

 

vasu kaun hai jaane inaka jeevan parichay
vasu kaun hai jaane inaka jeevan parichay

कौन है वसु जाने इनका जीवन परिचय:-

‘वसु’ शब्द का अर्थ ‘वसने वाला’ या ‘वासी’ है। धरती को वसुंधरा भी कहते हैं। 8 पदार्थों की तरह ही 8 वसु हैं। इन्हें ‘अष्ट वसु’ भी कहते हैं। इन आठों देवभाइयों को इन्द्र और विष्णु का रक्षक देव माना जाता है। सभी का जन्म दक्ष कन्या और धर्म की पत्नी वसु से हुआ है। दक्ष कन्याओं में से एक सती भी थी, जो शिव की पत्नी थीं। सती ने दूसरा जन्म पार्वती के रूप में लिया था। स्कंद पुराण के अनुसार महिषासुर मर्दिनी दुर्गा के हाथों की अंगुलियों की सृष्टि अष्ट वसुओं के ही तेज से हुई थी।

वसुओं की उत्पत्ति की कथा :-

8 वसुओं में सबसे छोटे वसु ‘द्यो’ ने एक दिन वशिष्ठ की गाय नंदिनी को लालचवश चुरा लिया था। वशिष्ठ को जब पता चला तो उन्होंने आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। वसुओं के क्षमा मांगने पर वशिष्ट ने 7 वसुओं के शाप की अवधि केवल 1 वर्ष कर दी। ‘द्यो’ नाम के वसु ने अपनी पत्नी के बहकावे में आकर उनकी धेनु का अपहरण किया था अत: उन्हें दीर्घकाल तक मनुष्य योनि में रहने तथा संतान उत्पन्न न करने, महान विद्वान और वीर होने तथा स्त्री-भोग परित्यागी होने को कहा। इसी शाप के अनुसार इनका जन्म शांतनु की पत्नी गंगा के गर्भ से हुआ। 7 को गंगा ने जल में फेंक दिया, 8वें भीष्म थे जिन्हें बचा लिया गया था। लेकिन इससे इतर भी उनकी मनुष्य योनि में जन्म से पूर्व की कथा प्राचीन है।

वेद और पुराणों में 8 वसुओं के नाम:-

वेद और पुराणों में इनके अलग-अलग नाम मिलते हैं। स्कंद, विष्णु तथा हरिवंश पुराणों में 8 वसुओं के नाम इस प्रकार हैं:- 1. आप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धर, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभाष। भागवत पुराण के अनुसार- द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु

वसुओं का पराक्रम, वरदान एवं श्राप :-

जालंधर दैत्य के अनुचर शुंभ को वसुओं ने ही मारा था। पद्मपुराण के अनुसार वसुगण दक्ष के यज्ञ में उपस्थित थे और हिरण्याक्ष के विरुद्ध युद्ध में इन्द्र की ओर से लड़े थे। भागवत में कालकेयों से इनके युद्ध का वर्णन है। एक कथा के अनुसार पितृशाप के कारण एक बार वसुओं को गर्भवास भुगतना पड़ा, फलस्वरूप उन्होंने नर्मदातीर जाकर 12 वर्षों तक घोर तपस्या की। तपस्या के बाद भगवान शंकर ने इन्हें वरदान दिया। तदनंतर वसुओं ने वही शिवलिंग स्थापित करके स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

क्या आप अपनी कुंडली या घर का वास्तु दिखाना चाहते हैं?
हमारे Facebook Page से जुड़ें और अपनी समस्याओं का समाधान पाएं।

फेसबुक Page Join करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें